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देश की 6 बड़ी दूरसंचार कंपनियों ने सरकार को लगाया 12,489 करोड़ का चूना

75 Days ago
| by RTI News

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नई दिल्लीः भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने कहा है कि दूरसंचार क्षेत्र की छह निजी कंपनियों ने सरकार को 12,000 करोड़ रूपये के राजस्‍व का नुकसान पहुंचाया है। यह बात नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने आज संसद को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कही है।

कैग ने निजी दूरसंचार सेवाप्रदाताओं की राजस्व भागीदारी पर अपनी रिपोर्ट शुक्रवार को संसद में रखी। रिपोर्ट में कहा गया है कि छह निजी दूरसंचार कंपनियों के रिकार्ड की जांच के दौरान कुल 46,045.75 करोड़ रुपए का कम सकल राजस्व दिखाया गया है। इससे लाइसेंस शुल्क पर 3,752.37 करोड़ रुपए, स्पेक्ट्रम प्रयोग शुल्क पर 1,460.23 करोड़ रुपए का असर पड़ा। इस कम या भुगतान न किए जाने पर कुल ब्याज 7,276.33 करोड़ रुपए बैठता है। रिपोर्ट में 2006-07 से 2009-10 के दौरान भारती एअरटेल, वोडाफोन इंडिया, रिलायंस कम्युनिकेशंस, आइडिया सेल्युलर, टाटा टेलीसर्विसेज व एअरसेल और उनकी अनुषंगियों द्वारा सरकार को किए गए राजस्व हिस्से के भुगतान में महत्त्वपूर्ण रूप से सुधार और उसे पूर्ण करने का तथ्य सामने आया है।

रिपोर्ट के अनुसार, रिलायंस कम्युनिकेशन द्वारा सकल राजस्व को कम कर दिखाने का वित्तीय प्रभाव 1,507.25 करोड़ रुपए बैठता है। टाटा टेलीसर्विसेज के लिए यह 1,357.68 करोड़ रुपए, एअरटेल के लिए 1,066.95 करोड़ रुपए, वोडाफोन के लिए 749.85 करोड़ रुपए, आइडिया के लिए 423.26 करोड़ रुपए और एअरसेल के लिए 107.61 करोड़ रुपए बैठता है। दूसरी ओर दूरसंचार कंपनियों द्वारा भुगतान किए गए एकमुश्त प्रवेश शुल्क के समायोजन से सरकार को 5,476.3 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। इन कंपनियों ने 2008 में इस शुल्क का भुगतान किया था और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इनके लाइसेंस रद्द कर दिए गए थे। संचार व आइटी क्षेत्र पर कैग की अंकेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है.

 ‘लाइसेंसधारकों द्वारा 2008 में भुगतान किए गए 5,476.30 करोड़ रुपए के गैर-रिफंडेबल प्रवेश शुल्क का समायोजन किए जाने से सरकार इतना राजस्व प्राप्त करने से वंचित रह गई।’ ‘नवंबर 2012-मार्च 2013 में 1800 मेगाहर्ट्ज-800 मेगाहर्ट्ज में स्पेक्ट्रम के लिए देय नीलामी मूल्य में इस राशि का समायोजन किया गया। इन कंपनियों द्वारा पूर्व में हासिल स्पेक्ट्रम को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवैध घोषित कर दिया गया था।’ सरकार ने उन कंपनियों द्वारा भुगतान किए गए लाइसेंस शुल्क को 2012 में समायोजित करने का निर्णय किया जिनके परमिट 2जी मामले में रद्द कर दिए गए थे।

शर्तों का किया उल्लंघन
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन कंपनियों ने लाइसेंस की शर्तों का उल्‍लंघन किया तथा लाइसेंस और स्‍पेक्‍ट्रम उपयोग शुल्‍क का उचित भुगतान नहीं किया, जिससे सरकार को कम राजस्‍व मिला है।

सात लाख करोड़ के पार पहुंचा बकाया कर
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने आज कहा कि मार्च 2015 में बकाया कर बढ़कर सात लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया जबकि मार्च 2014 में यह 5.75 लाख करोड़ रुपये रहा था।  कैग ने आज संसद में पेश रिपोर्ट में कहा कि आयकर कानून में बकाया वूसली और रिकवरी के स्पष्ट प्रावधानों जैसे बकायेदारों की चल-अचल संपत्ति जब्त करने या बेचने के साथ ही रिसीवर नियुक्त करने की व्यवस्था के बावजूद बकाये कर में बढोतरी हो रही है।  रिपोर्ट में कहा गया है कि बकाये कर में से 96 प्रतिशत की वर्ष 2014-15 में वसूली कठिन हो गई।  कैग ने कहा कि मांग किये जाने के बावजूद वसूली नहीं होने की मुख्य वजह रिवकरी वाली संपत्तियों का अपर्याप्त होना या संपत्ति के बारे में जानकारी नहीं मिल पाना है। इसके साथ ही इस तरह के मामलों की संपत्ति को बेचने और बकाये की मांग करने का मामला कई एजेंसियों के पास होता है।

स्वैच्छिक अनुपालन घोषणाओं में आई कमी
रिपोर्ट में कहा गया है कि कॉर्पोरेट और गैर कॉर्पोरेट के स्वैच्छिक अनुपालन के तहत घोषणायें वर्ष 2013-14 में 84.6 प्रतिशत थी जो वर्ष 2014-15 में घटकर 83.2 प्रतिशत पर आ गयी। कैग ने कहा कि वर्ष 2014-15 में प्रत्यक्ष कर इससे पिछले वित्त वर्ष की तुलना में नौ प्रतिशत बढ़कर 57196 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। इसके बावजूद सकल कर राजस्व संग्रह में प्रत्यक्ष कर की हिस्सेदारी वर्ष 2014-15 में घटकर 55.9 प्रतिशत पर आ गयी जबकि इससे पिछले वित्त वर्ष में यह 56.1 प्रतिशत रही थी।

निगरानी तंत्र की कमी मुख्य कारण
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2010-11 से वर्ष 2014-15 के दौरान कॉर्पोरेट कर और आयकर में क्रमश: 9.5 प्रतिशत और 16.7 प्रतिशत की वार्षिक बढ़ोतरी दर्ज की गयी है। कैग ने कहा कि केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने लंबे समय से लंबित और माफ करने की आवश्यकता वाले हाई वैल्यू मामलों की निगरानी के लिए कोई तंत्र नहीं बनाया है।



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