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भारत को नेपाल के चीन कार्ड से घबराने की जरूरत नहीं

93 Days ago

नेपाल ने चीन के साथ बीजिंग में ट्रांजिट एंड ट्रांसपोर्ट समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इससे भारत के रणनीतिकारों को ऐसा लग रहा है कि नेपाल का झुकाव चीन की तरफ बढ़ रहा है।

कई लोगों का कहना है कि इससे नेपाल में भारत का लंबे समय से चला आ रहा यह एकाधिकार खत्म हो जाएगा। अब नेपाल चीन से भी व्यापार कर सकेगा और ईधन का आयात कर पाएगा।

चारों तरफ से जमीनी सीमा के कारण पारगमन की सुविधा पाना नेपाल का मौलिक अधिकार है और अभी तक नेपाल को भारत और बांग्लादेश से पारगमन की सुविधा मिली हुई थी।

भारत ने नेपाल को पारगमन के लिए चीन की तरफ झुकते देखा तो पिछले महीने नेपाल के प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली के दौरे के दौरान नेपाल को विशाखापट्टन बंदरगाह के इस्तेमाल की अनुमति देने के समझौते पर सहमत हुआ था। अब तक नेपाल केवल कोलकाता के हल्दिया बंदरगाह का उपयोग कर रहा था, जिससे देश का एक-तिहाई व्यापार होता है। लेकिन यह बंदरगाह विशाखापट्टन बंदरगाह के मुकाबले छोटा है। इसके साथ ही भारत ने नेपाल का झुकाव चीन की ओर होते देख उसे सड़क परिवहन के लिए बांग्लादेश से होते हुए जाने की भी अनुमति दी थी।

ऐसा कहा जा रही है कि नेपाल ने भारत के सामने एक दशक पहले ही ये सारी मांगे रखी थी, लेकिन भारत अब नेपाल की दोस्ती चीन से बढ़ते देख कर इन समझौतों पर सहमति जताई है। यह भी कहा गया है कि नेपाल में एक समुदाय की मांग को समर्थन देते हुए अगर भारत ने नाकेबंदी नहीं की होती तो आज नेपाल चीन की तरफ नहीं झुका होता।

चीन के साथ पारगमन समझौते के बाद भारत के रणनीतिक गलियारे में यह समझा रहा है कि नेपाल अब चीन के बंदरगाहों का इस्तेमाल व्यापार के लिए कर सकेगा, जिससे भारत पर उसकी निर्भरता घटेगी। लेकिन वे जमीनी सच्चाइयों से दूर हैं। क्योंकि दोनों देशों के बीच संधि और बात है लेकिन उसे लागू करना दूसरी बात है।

नेपाल की तरफ बुनियादी संरचनाएं काफी खस्ताहाल हैं। दोनों ही देशों के बीच भौगोलिक स्थितियां काफी दुरुह हैं। जब तक नेपाल से केरूंग (चीन की तरफ इसे गाइरोंग कहा जाता है) तक रेलवे लाइन नहीं बिछा दी जाती, तब तक नेपाल चीन के माध्यम से व्यापार नहीं कर सकता। दोनों ही देशों की तरफ से जब तक सीमा तक अवसंचरना का निर्माण नहीं हो जाता, तब तक नेपाल चीन पर पूरी तरह निर्भर नहीं हो सकता। खासतौर से नेपाल की तरफ से बुनियादी अवसंरचना के निर्माण में कई सालों का वक्त लग सकता है।

नेपाल के पूर्व वाणिज्य सचिव पुरुषोत्तम ओझा का कहना है कि चीन का सबसे नजदीकी बंदरगाह ताईजिन है, जो नेपाल की सीमा से 3,000 किलोमीटर दूर है। जबकि भारत का हल्दिया बंदरगाह नेपाल से महज 1,000 किलोमीटर की दूरी पर है। इससे नेपाल के व्यापार लागत में काफी बड़ा फर्क पड़ता है।

ओझा कहते हैं, "नेपाल का चीन के साथ समझौता रणनीतिक रूप से काफी सही है। लेकिन जब तक नेपाल से चीन तक रेल सेवा की शुरुआत नहीं हो जाती, तब तक यह काफी महंगी पड़ेगी। चीन का कहना है कि तेईजिन तक रेलमार्ग का निर्माण 2020 तक हो पाएगा। इसलिए मैं तेईजिन मार्ग से व्यापार करने नहीं जा रहा हूं, क्योंकि यह तीन गुना महंगा पड़ेगा।"

जाने माने अर्थशास्त्री बिशंभर पायकुरेल का कहना है, "बिना कनेक्टिवटी पर जोर दिए इस ट्रांजिट समझौते का कोई फायदा नहीं है।"

नेपाल का भारत के साथ कारोबार 24 छोटे-बड़े व्यापार केंद्रों के माध्यम से होता है, जबकि चीन के साथ उसका केवल एक व्यापार केंद्र है। उसके बाद भारत ने नेपाल से साथ पांच रेल गलियारा बनाने का प्रस्ताव दिया है, जिसमें से एक उत्तर प्रदेश से काठमांडू तक बनाने की तैयारी है।

जमीनी सच्चाइयों को देखते हुए ऐसा लगता है कि नेपाल का चीन कार्ड महज छलावा है, लेकिन इसका असर भारत पर यह हुआ है कि अब भारत नेपाल को गंभीरता से लेने लगा है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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