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'सिंधु नदी जल समझौते पर पुनर्विचार पाकिस्तान के हित में नहीं'

77 Days ago

डॉन अखबार के संपादकीय 'इंडस वाटर्स ट्रीटी' में बुधवार को कहा गया कि सीनेट के प्रस्ताव में भारत सरकार के साथ सिंधु नदी जल समझौता पर फिर से चर्चा की बात कही गई है, जो विचित्र लगती है।

संपादकीय में लिखा गया है, " प्रस्ताव का समर्थन करने में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के सदस्यों ने बड़ी तत्परता दिखाई और इससे भ्रम पैदा होता है। जब वे (पीपीपी) सत्ता में थे तो उन्हें ऐसा करने के कई अवसर मिले। फिर भी उन्होंने कुछ नहीं किया था। "

संपादकीय में कहा गया है कि ऐसा प्रतीत होता है कि सांसद या तो अनभिज्ञ हैं कि संधि पर फिर से चर्चा का मतलब क्या है या वे इसके प्रति गंभीर नहीं हैं।

अखबार का मानना है कि संधि पर फिर से चर्चा करने पर पाकिस्तान के लिए समस्याओं का पहाड़ खड़ा हो जाएगा और यह उसके हित में नहीं होगा। भारत आज कार्रवाई करने के लिए कहीं अधिक स्वायत्त है। इतना वह विभाजन के समय नहीं था जब यह संधि हुई थी।

अखबार का कहना है कि पाकिस्तान को यह महसूस करना चाहिए कि वह घरेलू कारणों से जल समस्या से त्रस्त है न कि इसका कोई संबंध संधि से है। संपादकीय में कहा गया है कि पाकिस्तान में कृषि कार्यो के लिए बड़े पैमाने पर मीठे पानी का इस्तेमाल होता है। समस्या का संबंध शासन से है जो पानी के आवंटन को नियंत्रित करता है या फिर कृषि कार्य में पानी की बर्बादी से है।

संपादकीय में कहा गया, "इस समस्या को दूर करने के लिए शायद ही कोई प्रयास हुए हैं, जैसे और अधिक जलाशयों के निर्माण की कोशिश की गई हो।"

संपादकीय में आश्चर्य व्यक्त करते हुए लिखा गया, " संधि पर 'फिर से चर्चा' के लिए भारत को मजबूर करने के लिए पाकिस्तान के पास क्या कानूनी विकल्प हैं? हम लोग इस प्रक्रिया से क्या चाहते हैं? और, हमारी शर्तो के अनुपालन से हम लोगों को क्या हासिल होगा? "

संपादकीय में कहा गया है कि बेचारे जल संसाधन और ऊर्जा राज्य मंत्री ने सदन में इन मुद्दों को उठाने की कोशिश की, लेकिन आसंदी ने इन्हें रेखंकित किए जाने से पहले ही प्रस्ताव मत विभाजन के लिए भेज दिया। नतीजा है कि बड़ी अजीब स्थिति उत्पन्न हो गई है। सांसदों के हाथों में धमाकेदार प्रस्ताव है, लेकिन उन्हें यह पता नहीं है कि आगे क्या करना है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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